सोमवार, 28 अगस्त 2017

जब भी नृत्य की शुरुआत करें क्लासिक्ल नृत्य से हीं करें

अगर आप या आपके पेरेंट्स आपको बेहतर नर्तक बनाना चाहते हों तो इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आप की शुरुआत क्लासिकल नृत्य से ही होना चाहिए क्योंकि क्लासिकल सीखने से आप का दिमाग एक खास माइंड सेट में ढल चुका होता हैं और आपके अंदर धैर्य विनम्रता जैसे गुणों का विकास होता है।
कहीं ना कहीं आज के इस दौर में हम जी रहे हैं जहां बेहतरीन तकनीक बहुत अंदर तक जज्ब हो चुका है और हमारा धैर्य खत्म होता जा रहा है हमें सारी चीजें तुरत-फुरत चाहिए होती है, देरी होना अच्छा नहीं लगता अब, लेकिन जिस तरह से हमें आज भी अच्छे जॉब या बेहतर जीवनसाथी या किसी बीमारी से बाहर आने जैसी कई चीजों का जिन पर हमारा कोई कंट्रोल नही हम उनका इंतजार करते हीं हैं ! भारतीय शास्त्रीय नृत्य आपको इन्हीं सब चीजों के लिए धीरज सिखाता है उनके कठिन शब्दों से निपटने में मददगार साबित होता है. इस नृत्य में आप वर्तमान समय में रहना भी सीख जाते हैं. यह नृत्य हमारे मन ,आत्मा और शरीर के कनेक्शन यानी जुड़ाव को समझने में भी मदद करता है. हमारा मन जो काफी चंचल होता है जो हर वक्त एक डाल से दूसरी डाल पर जाना चाहता है । इस स्थिति से क्लासिकल नृत्य हमें बाहर निकाल सकता है क्योंकि प्रशिक्षण के दौरान हमें एक मुद्रा में दृढ़ता से खड़े होना, रूकना सिखाया जाता है.जब आप इन नृत्य रूपों का अभ्यास करते हैं, तो आप मूल रूप से अपने दिमाग को प्रशिक्षण देने के लिए एक समय पर विस्तारित अवधि के लिए ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। यह आपको हमेशा वर्तमान में रखेगा और वर्तमान क्षण के बारे में जानकारी देगा. 

बहुत सारे ऐसे नृत्य हैं जिसको अभ्यास किया जाता है और जिससे आपको अपना वजन कम करने में मदद मिलती है । लेकिन जब आप भारतीय शास्त्रीय नृत्य रूपों का अभ्यास करते हैं, तो आप न केवल मांसपेशियों की ताकत और धैर्य का निर्माण करते हैं, बल्कि सांस लेना भी सीखते है। एक बार जब आप नृत्य कक्षा में शामिल हो जाएं तो इसे जरूर सिख कर सुधारना चाहिए।
भारतीय शास्त्रीय नृत्य सिर, गर्दन और अंग समन्वय को धीरे धीरे पढ़ते हैं और फिर तेजी से समझने में सिद्धहस्त हो जाते हैं जैसे कि आप अपने बाएं और दायें दिमाग का इस्तेमाल विभिन्न चीजों को करने के लिए करते हैं। वैसे अलग-अलग चीज़ों को एक ही समय में करने के लिए अपने बाएं हाथ और दाएं हाथ को एक समय मे एक साथ इस्तेमाल करना कठिन है पर असंभव नही। उचित अभ्यास से आप अपने सभी अंगों को इस तरह से प्रशिक्षण दें सकते हैं और फिर अपने मस्तिष्क के कनेक्शनों के चमत्कार को भी देख सकते है!!
आप चाहते हैं कि आप खुद को कंट्रोल कर सकें यानि आप अपने मन के गुलाम न हो बल्कि आपका मन आपका गुलाम हो तो यह क्लासिकल नृत्य से संभव है। अपने दैनिक जीवन में, आप क्रोध, उदासी, खुशी, प्यार, उत्तेजना और इसी तरह के कई भाव महसूस करते हैं। भारतीय शास्त्रीय नृत्यों से आप इन भावनाओं को एक रेचक रिहाई देते हैं। कई भावनात्मक भूमिकाएं करते समय, आप भावनाओं के बीच संबंध को समझना शुरू करेंगे - मन और शरीर। क्लासिकल नृत्य आपकी भावनाओं को बेहतर ढंग से देखने या समझने में आपकी सहायता करेगा, और निश्चित रूप से, आप प्रतिक्रिया को रोक देंगे, और आपका खुद पर आपके अनुरूप ही कंट्रोल होगा,भावनाएं आपके काबू में होंगी। हर नृत्य का अपना अलग साइंस होता है, हर नृत्य में इस्तेमाल होने वाले मुद्राएं शारीरिक पोस्चर अलग-अलग होते हैं जिससे अलग-अलग बॉडी पार्ट्स और मसल्स प्रभावित होते हैं। आप अपनी इच्छा अनुसार कोई भी क्लासिकल नृत्य का फॉर्म चुन लीजिए, और फिर इनका नियमित अभ्यास आपके शरीर को फ्लेक्सिबल बनाएगा और मुद्राओं से बेहतर सामंजस्य बनाएगा। अगर आप क्लासिकल नृत्य सीखना शुरू करते हैं तो आप नेचुरल मुद्राओं का सामंजस्य बॉडी से समझने लगेंगे और जिस तरह क्लासिकल नृत्य में विभिन्न तरीके से मुद्राएं होती है यानी ज्यादा से ज्यादा बॉडी पार्ट्स का इस्तेमाल होता है इतना किसी और नृत्य फॉर्म में एक साथ शरीर के हर अंगों का इस्तेमाल शायद ही होता है, इसलिए अगर आप क्लासिकल नृत्य का प्रशिक्षण ले लेते हैं तो आपके लिए दुनिया के किसी भी नृत्य को सीखना और समझना आसान हो जाएगा। क्लासिकल नृत्य के साथ सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि आध्यात्मिक स्तर पर भी यह आपको उन्नत बनाता है आपके अंदर इतनी समझ पैदा करता है कि आप अपने शरीर, आत्मा और परमात्मा को समझ सकें, महसूस कर सकें।
इन सबके साथ-साथ क्लासिकल नृत्य का और भी बहुत बड़ा फायदा होगा जिसे शायद अभी मैंने समझा नही है या मुझे मालूम ही न हो और फिर मेरी एक आर्टिकल में उन सबको समेटना संभव भी नहीं है! तो इतने बड़े फायदों के साथ आप जब भी अपनी शुरुआत करें तो क्लासिकल नृत्य के साथ करें। उचित गुरु तलाश करें और पूर्ण समर्पण के साथ इस क्लासिकल नृत्य का प्रशिक्षण लें और इसका लाभ उठाएं।
धन्यवाद

शनिवार, 26 अगस्त 2017

तालों में विभिन्न लयकारियाँ लिखने का तरीका

यहां मैं आपको तीनताल के माध्यम से बताउंगी कि तरह-तरह की लयकारियों को कैसे लिखें।सबसे पहले ठाह लय को तीनताल में समझिये। तीनताल में कुल १६ मात्राएँ और ४ विभाग होतें हैं, जिसमे ३ तालियां पहली,पांचवी और तेरहवी मात्रा पर आती है. तथा खाली नवी मात्र पर दिखाई जाती है . निचे तीनताल की ठाह लय लिपिबद्ध किया गया है जिसका चित्र निम्न हैं .
ठाह लय तीनताल 
अब हमें तीनताल की दुगुन को लिपिबद्ध करना है.इसके लिए सबसे पहले तीनताल के पुरे आवर्तन को दो बार बिना विभाग लगाये या कोई मात्र लगाये दो बार लिख लेंगे.फिर जैसे ठाह लय में एक मात्रा में एक बोल को लिखा गया है वैसे ही दुगुन लय के लिए एक मात्रा में दो बोल लिखेंगे और उसे निचे से अर्ध चंद्राकर चिन्ह से घेर देंगे.  जैसे चित्र में है ―›  (  ͜  ) दुगुन लय के लिए चित्र को देखें....
दुगुन लय तीनताल 
अब तीनताल की दुगुन के बाद तीनताल की तिगुन को लिपिबद्ध करना है. जैसे दुगुन में हमने एक मात्र में दो बोल को चंद्राकर चिन्ह से घेरा वैसे ही तिगुन में एक मात्रा में तिन बोलों को चंद्राकर में घेरना है. इसके लिए सबसे पहले तीनताल के पुरे आवर्तन को तीन बार बिना विभाग लगाये या कोई मात्र लगाये लिख लेंगे. और तिन बोलों को चंद्राकर में घेरते हुये मात्रा और ताली खाली का चिन्ह लगा कर विभाग बाँट देंगे. तिगुन लय के लिए चित्र को देखें....
तिगुन लय तीनताल
अब तीनताल की तिगुन के बाद तीनताल की चौगुन को लिपिबद्ध करना है. जैसे दुगुन में हमने एक मात्र में दो बोल को चंद्राकर चिन्ह से घेरा वैसे ही चौगुन में एक मात्रा में चार बोलों को चंद्राकर में घेरना है. इसके लिए सबसे पहले तीनताल के पुरे आवर्तन को चार बार बिना विभाग लगाये या कोई मात्र लगाये लिख लेंगे. और चार-चार बोलों को चंद्राकर में घेरते हुये मात्रा और ताली खाली का चिन्ह लगा कर विभाग बाँट देंगे.चौगुन लय के लिए चित्र को देखें....
चौगुन लय तीनताल 
इसी तरह हम किसी भी ताल की दुगुन तिगुन या चौगुन लय उपरोक्त विधि से बना सकते हैं .

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

नृत्य और हमारी मुद्राओं का संबंध

नृत्य के माध्यम से, मानव शरीर एक साधन के रूप में कार्य करता है जो खुद को आंदोलन के दायरे से अर्थ के दायरे में परिवर्तित करता है। परिवर्तन की इस प्रक्रिया में शरीर के प्रत्येक अंग और उपांग शामिल होते हैं। थीम की मांग के अनुसार हाथ, पैर, हथेली, पैर, चेहरे के आंदोलन पर जोर दिया जाता है। यह मानव शरीर के इन सभी भागों के तालबद्ध ढंग से प्रेरित और जानबूझ कर किया गया विशिष्ट आंदोलन है, जो नर्तक अथवा दर्शकों के लिए एक दृश्य छवि बनाता है। इस प्रकार दर्शकों की आंखों के सामने नृत्य एक विचार या सोंच के रूप में शुरू होता है और एक उत्पादक क्रिया में समाप्त होता है। किसी को लिखने के लिए जैसे वर्णमाला की जरूरत होती है, पेंटिंग के लिए ब्रश की वैसे ही समझा जाए तो एक नर्तकी का शरीर भी उपकरण हैं और नक्काशीदार छवि / कोरियोग्राफी नर्तकी की जरूरत है. यह सब उसकी भाषा है, जो उसकी अभिव्यक्ति के लिए शब्दावली के रूप में कार्य करता है। हर संस्कृति के लिए यह व्यवहार और व्यवहार पैटर्न के एक सेट के साथ सहूलियत प्रदान करता है ये निर्धारित व्यवहार पैटर्न उन्हें उसी समाज के साथ ही साथ अन्य समाजों के समूहों और उप-समूहों के सदस्यों से अलग करने में मदद करते हैं। अभिव्यक्ति के ये तरीके न केवल दैनिक विचार-विमर्श को प्रभावित करते हैं बल्कि रचनात्मक विचार-विमर्श को भी प्रभावित करते हैं। इस प्रकार इस क्षेत्र की उत्पत्ति कला रूपों द्वारा किया जाता है।
भारत जैसे एक बड़े उप-महाद्वीप में, विभिन्न विविध संस्कृतियों ने संस्कृतियों के कई कलाओं का मार्ग प्रशस्त किया।विभिन्न शास्त्रीय नृत्य,भारत में अपनी तकनीक और कार्यप्रणाली की वजह से एक ही छत के नीचे आते हैं और एक ही समय में इन तकनीकों की अनूठी विशेषताओं के रूप में कार्य करने वाली विशेषताओं के कारण एक दूसरे से भिन्न इन नृत्यों को, भिन्न करते हैं। उदाहरण के लिए 'इशारा भाषा' का प्रयोग लगभग सभी नृत्यों में एक ही मुद्रा से होती है । कुचीपुड़ी, भरतनाट्यम, ओडिसी, कथकली और मोहिनीअट्टम जैसे लगभग सभी शास्त्रीय नृत्य हाथों के इशारों के लिए एक प्रमुख महत्व देते हैं। कथकली में, जो कि एक नृत्य-नाटक के रूप में जाना जाता है, ये इशारों का इस्तेमाल प्रत्येक शब्द और अर्थात्मक शब्दों की व्याख्या करने के लिए किया जाता है। हालांकि इशारों की भूमिका एक समान है, लेकिन इस तरह के विवरणों में अन्य रूपों में उपयोग नहीं किया जा सकता है। हालांकि, यह हथेली से भी इस अर्थ को प्रस्तुत किया जाता है और दक्षिण भारत में अभिव्यक्ति का सामना करने वाले कला क्षेत्र में यह मुद्रा चेहरे के माध्यम से भी की जाती है, जबकि कथक और मणिपुरी जैसे उत्तर भारतीय नृत्य रूपों में इशारों एक तरह की भूमिका निभाते हैं। और वहां हाथों से किया जाने वाला भाव पूरे शरीर के माध्यम से किया जाता है।इसलिए भी एक मानव शरीर के विभिन्न सममूल्य के इस्तेमाल के बारे में नृत्य के माध्यम से जान सकता है। यह भारत के लिए अद्वितीय है कि हमारे पास इस देश के सभी शास्त्रीय नृत्य रूपों पर एक परिभाषित साहित्य है। भरतमुनी अपने नाट्यशास्त्र में हर तरह के आंदोलन की बात करते हैं और मंच पर इनका अपना-अपना उद्देश्य है। अनिवार्य रूप से सभी भारतीय नृत्य रूप नाट्यशास्त्र की भाषा से अपने अक्षर को निकालने और अपने स्वयं के अभिव्यक्ति में इन अक्षर को ढाल सकते हैं। इस प्रकार हम हर नृत्य रूप से मिलते हैं परिचित होते हैं, जो कि भारत की परंपरा के साथ मजबूत संबंध को दर्शाती  हैं।


बुधवार, 9 अगस्त 2017

भरत मुनि के नाट्य शास्त्र अनुसार कथक नृत्य में करण का प्रयोग


हाथ और पैरों का संयुक्त रुप से लयबद्ध संचालन नृत्य में करण कहलाता है दो करणों के कंबीनेशन से एक मातृका बनती है और दो,तीन या कभी-कभी चार मातृकाओं के संजोग से एक अंग हार बनता है। तीन करणों से एक कलापक बनेगा चार करणों के संजोग से संडका तथा पांच करणो के संजोग से एक समघटका का निर्माण माना जाता है। जबकि एक अंग हार में छह सात आठ या नौ कारणों को समाहित करके मुद्राएं बनती है।
वैसे यहां करण का उपयोग करने की बात मैं कत्थक में कर रही हूं जो बेहद कम है, क्योंकि कथक में अभिनय से ज्यादा नृत्य है। खासकर इसमें तत्कार,चक्कर और ताल/ लयकारीयों पर ध्यान ज्यादा दिया जाता है,जिस वजह से करण या अंगहार अभिनय प्रधान होने से कथक में इनका प्रयोग ना के बराबर है। पर नए परिप्रेक्ष्य में कहा जाए तो कत्थक नृत्य में करण का प्रयोग करने से इस नृत्य की और भी सुंदरता बढ़ सकती है इस नृत्य में चमत्कार तो पहले से हीं है।दुनिया में नृत्य के जितने भी प्रकार है सबका लक्ष्य एक ही है कि मंच पर रसोत्तपति हो और कलाकार तथा दर्शक एक ही इमोशन को महसूस करें व आनंद लें।नृत्य के दौरान एक नर्तक जो भी शारीरिक मुद्रा बनाता या बनाती है,वह मुद्रा जो शरीर की संरचना को खूबसूरत दिखाता है, व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाता है, वह करण कहलाता है।एक या बहुत से करणों से मिलकर बनी भाव भंगिमा अंगहार कहलाती है। करण और अंगहार दोनों हीं नृत्य और नर्तक दोनों के ग्रेस और खूबसूरती को बढ़ाते हैं। आइए जानते हैं कुछ करण की मुद्राओं और उनके उपयोग के बारे में-

●समनखा SAMANAKHA- भरत मुनि के नाट्य शास्त्र अनुसार प्रयोग मनोरंजन और आश्चर्य को दिखाने के लिए इस मुद्रा का प्रयोग नृत्य में किया जाता है। यह मुद्रा मंच पर नृत्य आरंभ करने से पूर्व की भी है जहां नर्तक खड़ा होता है।












 ●लीन LINA- नाट्य शास्त्र के अनुसार यह मुद्रा हिंदुओं के देवता से प्रार्थना या पूजा करने के दौरान बनाई जाती है। या धन्यवाद देने के लिए, आभार प्रकट करने के लिए भी बनाई जाती है।













●विषकम्भा VISHKAMBA- इस मुद्रा का प्रयोग नृत्य में स्त्री के वक्षस्थल को दिखाने के लिए या अपने प्रियतम से अलगाव/जुदाई दिखाने के लिए भी इस मुद्रा का प्रयोग किया जाता है।













●कटिछिन्न KATICHINNA- मनोरंजन और आश्चर्य दिखाने के लिए नृत्य में इस करण का प्रयोग किया जाता है।















●अर्ध रेचिता ARDHA RECHITA- इस मुद्रा का प्रयोग नृत्य में अपने प्रियतम को खुशी से देखने या निहारने के लिए जाता है। इस मुद्रा का प्रयोग अपना परिचय देने के लिए भी किया जाता है













 ●गंड सूची GANDA SUCHI- नृत्य में करण की इस मुद्रा का प्रयोग प्रार्थना करने, सुनने या विनम्रता से खड़े होने के लिए प्रयोग किया जाता है। 













●अवर्ता AVARTA- धन के स्वामी कुबेर को दर्शाने के लिए या उत्कृष्टता या श्रेष्ठता को दिखाने के लिए इस मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। 













●डोलापदा DOLAPADA- करण की इस मुद्रा का प्रयोग झुला या पालना के मूवमेंट को दिखाने के लिए किया जाता है।  या इसका प्रयोग अचानक से डर जाने के अभिनय के लिए भी किया जाता है।













●गजक्रीडिता GAJAKRIDITA- जैसा कि नाम से ही जाहिर है हाथी के कान को दिखाने के लिए इस मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। अगर हाथों को थोड़ा सा ऊपर की ओर इंडिकेट करें तो इस मुद्रा का प्रयोग क्राउन यानी ताज को दिखाने के लिए भी किया जाता है। ताज के अलावे सिर, केश,जुड़ा वगैरह को भी दिखाने के लिए किया जाता है।











●दंडा रेचिता DANDA RECHITA- दंड रेचिता का प्रयोग शक्ति और सामर्थ्य दिखाने के लिए या भगवान विष्णु के सर्प के बिछावन को दर्शाने के लिए भी इस मुद्रा का प्रयोग किया जाता है।













●वृषभा क्रीडिता VRISHABHA KREEDITA- करण की इस मुद्रा का प्रयोग चेहरे को दिखाने के लिए या अपने खूबसूरत बाल और उनका घुंघरालापन दिखाने के लिए इस मुद्रा का प्रयोग किया जाता है ।


गुरुवार, 27 जुलाई 2017

नव रस


मानव जीवन रंगीन कपड़े की तरह है जो कई घटनाओं से रंग और बनावट प्रदान करता है जो इसे आकार देता हैं। सांसारिक क्रियाएं जो हर दिन घटित होती हैं, साथ ही असाधारण घटनाएं जो हमारी जिंदगी को रोचक बनाते हैं, वे सभी धागे की तरह हीं हैं जो इसके निर्माण के लिए एक साथ बुने जाते हैं। इन सभी धागे के लिए एक आम बात यह है कि वे हमारे अंदर की भावनाओं को उजागर करते हैं, हम अपनी भावनाओं के साथ जवाब देते हैं इससे पहले कि वे हमारे आंतरिक जीवन का हिस्सा बन सकें। दरअसल, जीवन को विभिन्न संदर्भों और परिस्थितियों में उत्पन्न होने वाली भावनाओं की लगातार अनुक्रम के रूप में माना जा सकता है। ये भावनाएं, या रस, जो जीवन को अलग-अलग रंग और आकार देते हैं। इस प्रकार यह आश्चर्यजनक नहीं है कि दर्शकों को प्रभावित करने के लिए दर्शकों के समक्ष पेश करने की कोशिश करने वाले अधिकांश कलाकार कला रस या भावनाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यह रस कला या नाट्य का प्रदर्शन करने का मुख्य आधार है। यह एक तथ्य है जो सदियों से अच्छी तरह से पहचाना गया है। नाट्यशास्त्र एक प्राचीन भारतीय पाठ है, जो 2 शताब्दी ईसा पूर्व और दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच रचा गया। जो कला प्रदर्शन के सभी पहलुओं का विश्लेषण करता है। इसके महत्व के कारण इसे अक्सर पांचवा वेद कहा जाता है। इसमें रस पर बहुत डिटेल में लिखा गया है, यह भावनाएं जो जीवन के साथ ही आर्ट की विशेषता बताती हैं। नाट्यशास्त्र में नौ रसों का वर्णन किया गया है जो सभी मानव भावनाओं का आधार हैं। प्रत्येक पर विस्तार से टिप्पणी की गई है। यह ध्यान रखना उपयोगी है कि रस में सिर्फ भावना नहीं होती है, बल्कि विभिन्न चीजें हैं जो उस भावना का कारण बनती हैं। 

श्रृंगार रस
श्रृंगार का मतलब प्यार और सुंदरता है,इसके साथ स्थाई भाव रति का होता है। यह उस भावना का प्रतिनिधित्व करता है जो मानवीय मन की प्रदर्शित करता है, जो कि खूबसूरत दिखता है, जो प्रेम को प्रकट करता है। यह वास्तव में सभी रसों का राजा है और जो कला में सबसे ज्यादा और अक्सर चित्रण किया जाता है। इसका इस्तेमाल दोस्तों के बीच प्रेम, माता और उसके बच्चे के बीच प्रेम, भगवान के लिए प्रेम या गुरु और उसके शिष्यों के बीच प्रेम के लिए किया जा सकता है। कोई और भावना ईश्वरीय के साथ मानव के रहस्यवादी मन को बेहतर ढंग से प्रदर्शित करने में सक्षम नहीं है। श्रृंगार रस हृदय की भावना है, जो कलात्मक के लिए पूर्ण गुंजाइश देता है। यह नवीनता और सूक्ष्मता से भरा असंख्य मूड के चित्रण में मददगार है। भारतीय संगीत में भी इस रस का खूबसूरत धुनों के माध्यम से व्यापक चित्रण मिलता हैं। 
हास्य रस
हास्य यह रस खुशी या खुशी व्यक्त करने के लिए इस्तेमाल किया। यह साधारण हल्कापन या दंग रहकर हँसी के बीच में चित्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। एक दोस्त के साथ चिढ़ा और हँसते हुए, खुश रहना और लापरवाह होना या बस बेवकूफ और शरारती महसूस करना - ये हास्य रस के सभी पहलू हैं । भगवान कृष्ण के बचपन जब वह सभी गोकुल के प्रिय थे, तो उनके शरारती गतिविधियों की कई कहानियों से पूरा गोकुल भरा हुआ था। यह आप भी जानते हैं जो सभी को पसंद आता है। और यह सभी प्राचीन भारतीय कला रूपों में हास्य के सामान्य स्रोतों में से एक है।

वीभत्स रस
वीभत्स रस के साथ घृणा स्थाई भाव  है । हम यदि नाराज़ होते हैं, तो उस भावना से उत्पन्न होता घृणा है, जो हमें विद्रोही या बीमार करता है, हमें परेशान करता है वह वीभत्स है जिसे हम महसूस करते हैं। जब राजकुमार सिद्धार्थ ने एक युवा अभिभावक के रूप में, पहली बार बीमारी, बुढ़ापे और मृत्यु को देखा तो उन्हें घृणा का आभास हुआ जो बाद में दु: ख, गहरा आत्मनिरीक्षण और शांति में रूपांतरित हो गया था, और वह गौतम, बुद्ध बनें। आश्चर्य की बात नहीं है, यह भावना आमतौर पर क्षणभंगुर रूप से प्रदर्शित होती है यह आमतौर पर उच्च और अधिक सुखद भावनाओं के लिए उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है। 
रौद्र रस
रौद्र रस के साथ क्रोध स्थाई भाव है। क्रोध और उसके सभी रूप हैं- स्वयं का राक्षस क्रोध, दुस्साहसी व्यवहार और असहमति पर आक्रोश, अपराध के कारण क्रोध, अन्याय और अपमान के कारण क्रोध यह रौद्र के सभी प्रकार हैं। संभवतः रस  के सबसे हिंसक भाव हैं यह। रौद्र में भी दिव्य रोष और प्रकृति का रोष शामिल है जिसका इस्तेमाल अप्रत्याशित आपदाओं और प्राकृतिक आपदाओं को समझाने के लिए किया जाता है। भारतीय पौराणिक कथाओं में, विनाशकारी भगवान शिव को सभी असमाधान और विवाद का मालिक माना जाता है। शिव ने तांडव का प्रदर्शन किया एक रौद्र नृत्य जो तीनों आकाशों, पृथ्वी और पाताल में तबाही पैदा करता है।

शांत रस
शांत रस का स्थाई भाव निर्वेद है। यह शांत और अशिक्षित स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है जो कि सभी अन्य रसों की कमी से चिह्नित है क्योंकि सभी भावनाएं शांत में अनुपस्थित हैं, इसलिए ज्ञानियों में विवाद है कि क्या यह रस है। नाट्यशास्त्र के लेखक, भरत मुनि के अनुसार, अन्य आठ रस मूल रूप से ब्रह्मा द्वारा प्रस्तावित हैं और नौवां, शांत, उनका योगदान है। बुद्ध ने शांत रस को हीं महसूस किया गया था, जब वह उच्च आध्यात्मिक स्तर पर पहुंचे, जिसने उन्हें मोक्ष या निर्वाण तक पहुंचाया और उन्हें जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्त किया। शांत मन, शरीर और ब्रह्मांड के बीच पूर्ण सद्भाव का प्रतिनिधित्व करती है। भारत में संत , ऋषि इस रस को प्राप्त करने के लिए पूरे जन्मों का ध्यान करते हैं। संगीत में यह अक्सर एक स्थिर और धीमी गति के माध्यम से प्रदर्शित होता है।

वीर रस
वीर रस के साथ उत्साह स्थाई भाव है। यह बहादुरी और आत्मविश्वास का प्रतिनिधित्व करता है। चुनौतीपूर्ण बाधाओं के चेहरे में साहस और निडरता वीरता है। युद्ध में धीरज, जिस रवैए के साथ शहीदों ने युद्ध किया, और जिस वीरता के साथ वे मरते हैं, वे वीरता के सभी पहलू हैं। राम, रामायण के नायक, आम तौर पर इस रस के लिए आदर्श हैं। उनके आत्मविश्वास और वीरता के दस शक्तिशाली दिग्गज राजा रावण का सामना करते हुए। अभिमन्यु जैसे वीर से एक अलग प्रकार की वीरता प्रदर्शित की जाती है, जो जानबूझ कर युद्ध में गया जानते हुए कि शत्रु अधिक संख्या में होंगे और मौत निश्चित है। और फिर भी इतने बहादुर रूप से लड़ते हैं जैसे कि अपने दुश्मनों से भी प्रशंसा अर्जित करें। भारतीय संगीत में यह रस एक जीवंत गति और अप्रत्यक्ष ध्वनियों के द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

भयानक रस
भयानक रस के साथ भय स्थाई भाव है। सूक्ष्म और अज्ञात घबराहट के कारण, एक शक्तिशाली और क्रूर शासक द्वारा उत्पन्न असहायता की भावना, और आतंक के कारण मौत का सामना करना पड़े, यह भय के सभी पहलु हैं। किसी के कल्याण और सुरक्षा के लिए डर मनुष्य को ज्ञात सबसे पुरानी भावना माना जाता है। भया ऐसा महसूस करते हुए पैदा होता है जो अपने आप से कहीं ज्यादा शक्तिशाली और अधिक शक्तिशाली है और जो किसी के विनाश पर मर चुका है। भाया अभिभूत और असहाय होने की भावना है। भय, कायरता, आंदोलन, असुविधा, आतंक और कायरता भय के भाव के सभी पहलू हैं। भया का भी इस्तेमाल होता हैजो कि भय का कारण बनता है लोगों और परिस्थितियों में जो दूसरों को आतंक से दबाने के लिए प्रेरित करते हैं, वे इस रस के चित्रण के लिए केंद्र हैं, क्योंकि उनको डर लग रहा है। 
करुण रस
करुण रस का स्थाई भाव दुख और शोक है। अकस्मात त्रासदी और निराशा की भावनाएं, निराशा और दिल का दु: ख, एक प्रेमी के साथ विदाई के कारण दुःख, किसी प्रियजन की मृत्यु के कारण की पीड़ा सभी करुण रस हैं। इसीलिए, करुणा के कारण किसी को दुखी और पीड़ा से देखकर सहानुभूति उत्पन्न होती है ।करुणा एक व्यक्तिगत प्रकृति का हो सकता है, जब कोई खुद को उदास और परेशान करता है। अधिक अवैयक्तिक दुःख आम तौर पर मानव स्थिति के बारे में निराशा से संबंधित हैं, यह महसूस करते हुए कि सभी मानव जीवन दु:खों से भरा है। यह इस तरह की करुणा है कि बुद्ध अपने उद्धार के मार्ग पर विजय प्राप्त करने की कोशिश कर रहा थे। 

ये विभिन्न भावनात्मक अभिव्यक्तियों का उचित रूप से प्रदर्शन करें तो नृत्य या नाट्य के क्षेत्रों में एक व्यक्ति असंख्य प्रशंसकों से बहुत सम्मान प्राप्त करता है। उपरोक्त कारणों के कारण दर्शकों ने थिएटर / सिनेमा के भाग्य का फैसला किया है, इस पर निर्भर करता है कि स्टेज / स्क्रीन पर बनाई गई भूमिका को देखते हुए उनकी अपनी भावनाओं पर कैसे लगाया जाता है। यह रसों का प्रदर्शन दिलचस्प रोचक दैवीय लिंक है जो किसी भी जाति, रंग या लिंग से दर्शकों को मंच के कलाकारों को दर्शकों के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करता है। हालांकि, यह चयनित कुछ लोगों को ही श्रेष्ठ बना पाता  है जो इस कला से अवगत हैं या इसे प्रदर्शित करने में सिद्धहस्त हैं। यदि केवल दर्शक यह सीख सकते हैं और समाज में अभ्यास कर सकते हैं, तो उनके अंतर-व्यक्तिगत संबंधों में भारी बदलाव आएगा। जैसा कि हम आज की ज़िंदगी में जी रहे हैं, जो अनिश्चितताओं से भरा है और खोखले उम्मीदें नज़र आती है और इंसानी जीवन पूरी तरह से रोबोटों में बदल दी गई हैं, जिसमें हमारी भावनाओं को दबाने और हमारे कार्यक्रम से भटकने की ज्यादा उम्मीद है। 
धन्यवाद।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

गुरु ब्रह्म गुरु विष्णु....

गुरू-शिष्य संबंध विशेष रूप से हमारे धार्मिक और शैक्षणिक परंपराओं, संगीत और साथ ही नृत्य शिक्षा का पवित्र आधार रहा है। हमारे धार्मिक और ऐतिहासिक कहानियों में कई गुरु भक्ति के विषय हैं। हमारे समृद्ध इतिहास में भी कई उदाहरण हैं जो अपने गुरु के ज्ञान रूपी आशीर्वाद को ले  रहे हैं और गुरू के क्रोध या नाराजगी के कारण कुछ  शिष्यों के लिए गंभीर परिणाम भी सामने आए हैं। हमारे संगीत की शिक्षा और नृत्य की शिक्षा में भी, गुरू से शिष्य तक संगीत और नृत्य की अवधारणाओं के मौखिक हस्तांतरण की परंपरा सर्वोच्च बनाती है। कई वर्षों से संगीतकारों ने "गुरु" की प्रशंसा में कई कृतियों को तैयार किया है। क्षणभंगुर संबंधों की आज की दुनिया में, क्षणिक सुख की प्राप्ति की ओर लोगों की भागमभाग ने शिक्षकों का मूल्य और उसके सम्मान को, काफी प्रभावित किया है।नीचे गुरु की महिमा बखान करता यह श्लोक... इसे तो सबने सुना ही होगा।
गुरु ब्रह्म गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वराः
गुरूर साक्षात परमब्रह्मा तस्मै श्री गुरूवे नमः ||
             
            अर्थात
गुरु ब्रह्मा के अलावा कोई नहीं, निर्माता है।
गुरु, विष्णु, संरक्षक के अलावा अन्य कोई नहीं है।
गुरु महान भगवान शिव, विनाशक के अलावा अन्य कोई नहीं है।गुरु वास्तव में सर्वोच्च ब्राह्मण है दिव्य गुरु को मैं नमन करता हूं।
गुरु ईश्वर हैं,ऐसा शास्त्रों का कहना है। 'गुरु' एक प्राध्यापक का एक सम्मानजनक पद है, जैसा कि ग्रंथों में परिभाषित और समझाया गया है और महाकाव्यों सहित प्राचीन साहित्यिक संस्कृत शब्द में 'गुरु' का उल्लेख मिलता है। अंग्रेजी का संक्षिप्त ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी इसे "हिंदू आध्यात्मिक शिक्षक या धार्मिक पंथ के प्रमुख के रूप में परिभाषित करता है,या प्रभावशाली शिक्षक, प्रतिष्ठित गुरु भी।
                        क्या गुरु देवताओं की तुलना में अधिक वास्तविक नहीं हैं? मूल रूप से गुरु एक आध्यात्मिक शिक्षक है जो "ईश्वर-प्राप्ति" के पथ पर शिष्य का नेतृत्व करता है। संक्षेप में, गुरु को आदरणीय व्यक्ति माना जाता है, जो संत के गुणों के साथ अपने शिष्य जिसे वो दीक्षा मंत्र देता है, और जो अनुष्ठानों और धार्मिक समारोहों में निर्देश देता है, के मन को उजागर करता है।देवल स्मृती के अनुसार ग्यारह प्रकार के गुरु होते हैं और इसके अनुसार उनके कार्यों के अनुसार, उन्हें ऋषि, अचार्यम, उपाध्याय, कुलपति या चिंतामणि के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
गुरु की भूमिका
उपनिषद ने गुरु की भूमिका को गहराई से रेखांकित किया है। मुंडक उपनिषद ने अपने हाथों में समिधा घास वाले सर्वोच्च देवत्व का एहसास करने के लिए कहा है कि खुद को गुरु के समक्ष आत्मसमर्पण करना चाहिए जो वेदों के रहस्यों को जानता है। कट्टोपनिषद भी गुरु के रूप में बोलते हैं जो कि अकेले शिष्य को आध्यात्मिक पथ पर मार्गदर्शन दे सकते हैं। समय के साथ ही गुरु के पाठ्यक्रम ने धीरे-धीरे मानवीय प्रयास और बुद्धि से संबंधित अधिक धर्मनिरपेक्ष और अस्थायी विषयों को शामिल कर लिया है। सामान्य आध्यात्मिक कार्यों के अलावा, निर्देश के उसके क्षेत्र में अब कई विषयों जैसे-धनुरविदित्य (तीरंदाजी), अर्थशास्त्र (अर्थशास्त्र) और यहां तक ​​कि नाट्यशास्त्र (नाटक) शामिल हैं। गुरु के बारे में सबसे लोकप्रिय किंवदंती यह है कि अद्भुत युवा आदिवासी लड़के एकलव्य को गुरु द्रोणाचार्य ने खारिज कर दिया,तब एकलव्य ने उनकी मूर्ति को उठाया और महान समर्पण के साथ तीरंदाजी की कला का अभ्यास किया जिसके बाद गुरु द्रोणाचार्य द्वारा गुरुदक्षिणा में अंगूठा मांगे जाने पर एकलव्य ने निःसंकोच अपना अंगूठा गुरु के चरणों में समर्पित किया। चंदोग्य उपनिषद में, हम एक महत्वाकांक्षी शिष्य सत्यकमा से मिलते हैं, जो आचार्य हरिद्रमृत गौतम के गुरुकुला में प्रवेश पाने के लिए अपनी जाति के बारे में झूठ बोलने से इनकार करते है।
 योगदान
पीढ़ी से पीढ़ी तक गुरु की संस्था ने भारतीय संस्कृति के विभिन्न बुनियादी सिद्धांतों को विकसित किया है और संचारित आध्यात्मिक और मौलिक ज्ञान का परिचय दिया है। गुरुओं ने प्राचीन शैक्षणिक प्रणाली और प्राचीन समाज के अक्ष का गठन किया, और उनकी रचनात्मक सोच से सीखने और संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों को समृद्ध किया। इस प्रकार, गुरुओं के स्थायी महत्व और मानव जाति के उत्थान के उनके योगदान में निहित है।
 यह लेख भरतनाट्यम की गुरु श्री मीनाक्षी अजय के आर्टिकल The relevence of guru से प्रेरित है।
धन्यवाद।

बुधवार, 12 जुलाई 2017

ऑनलाइन कत्थक सीखें-3

                           चैप्टर 3
ततकार
ततकार शब्द की परिभाषिक व्याख्या कत्थक नृत्य के संदर्भ में करें तो पैर के तलवे द्वारा भूमि पर प्रहार या आघात करने की क्रिया तत्कार कही जाती है। ता थेई थेई तत कत्थक नृत्य का ऐसा उदाहरण है जिस पर कथक नृत्य निर्भर करता है। इसके हजारों प्रस्तार किए जा सकते हैं। तत्कार शब्द 700 वर्षों से भी पुराना है। तत्कार के अभ्यास के लिए कुछ आवश्यक चीजें हैं, जैसे घूँघरू कैसा होना चाहिए या उनकी संख्या कितनी होनी चाहिये। उसके बाद खड़ा होने का तरीका, पद संचालन का तरीका तथा घूँघरू पर रियाज से अधिकार।
घुंघरू
कत्थक नृत्य शैली के जैसा घुंघरु का प्रयोग अन्य किसी नृत्य में नहीं है। कथक में घुंघरुओं की ध्वनि की ओर अधिक ध्यान दिया गया है।
          अभिनय दर्पण के रचयिता नंदी केश्वर के अनुसार घुंघरु काँसे का होना चाहिए वह उन सभी  घुँघरुओं की बनावट एक जैसी होनी चाहिए, उनकी ध्वनि में अंतर जरा सा भी न हो इसका ध्यान रखना चाहिए।
कत्थक की शुरुआत करते समय घुंघरु एक पैर में 100-100 होने चाहिए,बाद में 250-250 तक की संख्या बढ़ा लेनी चाहिए। पुराने घूँघरू महत्वपूर्ण माने गए हैं। घूँघरू की पीरोई जाने वाली डोरी शास्त्रकारों द्वारा नीला बताया गया है। घूँघरू को एक गांठ एक घूँघरू की पद्धति से बांध लेना चाहिए। घूँघरू को धागों के साथ में गांठ ना लगाएं इससे घूँघरू की आवाज दब जाएगी।
पद संचालन के लिए शारीरिक मुद्रा
पद संचालन करते वक्त सीधे खड़े हो जाए व दोनों हाथ को कलाइयों से मोड़ते हुए उनका पृष्ठ भाग कमर पर रखें। पैरों को स्वाभाविक स्थिति में रखकर उठाएं व आघात करें जिससे पैर का पूरा तलवा भूमि से स्पर्श करें। पद संचालन के लिए दूसरी मुद्रा है हाथ बांध कर खड़े होने की। व तीसरी मुद्रा है बाएं हाथ में दाहिना हाथ रख कर खड़े होने की। इस मुद्रा में हाथ का स्थान होगा उत्पत्ति स्थान से थोड़ा नीचे व पेट से थोड़ा ऊपर।
तत्कार कैसे करें
सबसे पहले यहां मैं तीनताल तत्कार करने का तरीका बताऊंगी। तीनताल में 16 मात्रायें होती है अतः इसके ततकार में 16 बार दोनों पैरों से बारी-बारी आघात करना होगा। पहली मात्रा पर दांया पैर मारे,दूसरी मात्रा पर बायां,तीसरी मात्रा पर पुनः दायां पैर और चौथी मात्रा पर बायां पैर मारे।
5वीं मात्रा से इसे उल्टा करें यानि 5वीं मात्रा पर बायां पैर,6ठी मात्रा पर दायां पैर मारे, 7वीं मात्रा पर बायां पैर और 8वीं मात्रा पर दायां पैर मारे।
9वीं मात्रा से 12वीं मात्रा तक 1हली मात्रा से 4थी मात्रा के अनुसार करें।व 13वीं मात्रा से 16वीं मात्रा तक 5वीं से 8वीं मात्रा के अनुसार करें। सम स्थान पर पुनः दाहिना पैर आएगा। नीचे ग्राफ से समझे पैरों को दाहिना (दा) और बायां (बा) से संबोधित किया गया है। काले रंग से तीनताल की मात्रा,हरे रंग से तीनताल के बोल,नीले रंग से कत्थक के तत्कार के बोल और पीले रंग से पैरों का सम्बोधन किया गया है। और लाल रंग से तीनताल की ताली व खाली का स्थान बताया गया है।
1      2      3      4
धा    धीं    धीं     धा
ता    थेई   थेई    तत
दा      बा     दा    बा
×
5        6      7      8  
धा       धीं    धीं     धा
आ      थेई    थेई    तत
बा       दा      बा     दा
२
9     10      11      12  
धा     तीं       तीं       ता
ता     थेई      थेई     तत
दा      बा       दा        बा
०
13     14      15     16B
ता       धीं      धीं       धा
आ      थेई     थेई      तत
बा       दा       बा      दा
३

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

कैसे करें एक बेहतरीन मंच प्रदर्शन

एक बेहतरीन नृत्य मंच प्रदर्शन ईमानदारी से पूर्वनियोजित प्रयासों का परिणाम है। किसी भी नृत्य की शुरुआत में कुछ संगठन की आवश्यकता होती है।जो  नर्तकियों को मंच पर बेहतर प्रदर्शन करने में मदद करते हैं।
प्रदर्शन का अवसर जाने
यह जानना बहुत जरूरी है कि आप किस अवसर पर प्रदर्शन कर रहे हैं, यह एक नृत्य महोत्सव है, वैश्विक नर्तकियों की बैठक है, कॉलेज उत्सव है, प्रतियोगिता है या धार्मिक उत्सव आदि। अगर विषय निर्धारित
हो गया तो नृत्य को कोरियोग्राफ करने में मदद मिलती है। कांसेप्ट समझ में आने के बाद उससे रिलेटेड प्रोग्राम ही करना चाहिए जिसे दर्शक एन्जॉय करें।
दर्शक के प्रकार को समझे
एक बार इस अवसर को दर्शकों के नजरिये से भी जाने कि उन्हें कैसा नृत्य इस मौके पर पसंद आएगा। यह कदम महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नर्तक को यह तय करने में मदद करता है कि शास्त्रीय प्रदर्शन करें या अर्ध शास्त्रीय करें या लोक अवधारणा पर जाएं। यद्यपि नर्तक मंच पर उत्कृष्ट हो सकता है, लेकिन अगर रसिका या दर्शकों ने शो का आनंद नहीं उठाया, तो आपका प्रदर्शन अधूरा रहता है। तो एक नर्तकी के रूप में यह बहुत महत्वपूर्ण है। इसे ऐसे समझे कि दर्शकों की जरूरत है और आपको उनकी पसंद का वितरित करना है।
उचित गाने का चुनाव करें
एक अच्छा गीत दर्शकों पर बहुत प्रभाव डालता है। एक गीत का चयन इस अवसर के अनुरूप और दर्शकों किस तरह होंगे उनपे निर्भर करता है। उदाहरण, कॉलेज और स्कूल समारोहों के लिए वह गाना चुनें जो बहुत लोकप्रिय है और सामान्य व्यक्ति द्वारा पसंद किया जा रहा हो। प्रतियोगिताओं के मामले में प्रत्येक दौर के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, सही विकल्प बनाएं। अगर आपके पास एक लोककथा है जिसमें कोई कहानी हो तो एक प्रामाणिक लोक गीत का चयन करें। एक गीत को अभिनय और नृत्य दोनों पक्षों में प्रदर्शित करने वाली कोरियोग्राफी करनी चाहिए। गाना 15 मिनट से अधिक बड़ा या 5 मिनट से कम समय का नहीं होना चाहिए। एक पश्चिमी नृत्य के लिए प्रदर्शन करते समय जैज, साल्सा, टैप डांस या हिप हॉप की विभिन्न शैलियों का मिश्रण मत बनें।
अच्छी कोरियोग्राफी करें/करवाएं
कोरियोग्राफ़ी, संगीत या गाना को एक दृश्य रूप देने के बारे में है। संगीत के साथ सही इशारों और आंदोलनों को सम्मिलित करना एक कोरियोग्राफर का मुख्य काम है। उसे गाने के ताल या लय में बारीकी से ढालने की कला को समझने की जरूरत है।गाने में आये शब्दो का सही अर्थ पता होना चाहिए। जब अर्थ समझा में आ जाता है तब अभिव्यक्तियों को बाहर लाने में आसानी हो जाती है। इस प्रकार एक अच्छा कोरियोग्राफी नर्तक को आसानी से गीत के माध्यम से समझने में मदद करता है।अगर प्रतियोगिता में परफॉर्म कर रहें हो तो नृत्यांगना को अधिक अंक प्राप्त करने के लिए नृत्य निर्देशक के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि इसमें किसी भी नए स्टेप या जटिल कदम शामिल न करें। इससे नर्तक का आत्मविश्वास कम होगा।
भरपूर अभ्यास करें
सही अभ्यास एक कलाकार को परिपूर्ण बनाता है जितना अधिक आप अभ्यास करते हैं, उतना ही आपके लिए बेहतर है।अच्छा अभ्यास करने से आप स्टेप में बिना भ्रम की स्थिति में रहे अच्छा प्रदर्शन कर सकता हैं।अभ्यास सहनशक्ति बनाने में मदद करता है। बिना थके हुए प्रदर्शन के लिए ज्यादा अभ्यास आवश्यक है तब देर तक मंच का प्रदर्शन करना संभव होगा।
नृत्य करते समय अभिव्यक्ति देना सीखें यहां तक ​​कि सिर्फ संगीत और कुछ कम वाद्य की धुनों पर भी सूक्ष्म अभिनय/नृत्य के साथ दर्शकों को मन्त्र मुग्ध किया जा सकता है।अभ्यास में आईने के सामने खड़े होकर अपने भाव का विश्लेषण जरूर करें ऐसा करने से आपको अपना बॉडी पोस्चर सुधारने में आईना मदद करता है। समूह नृत्यों के मामले में सिंक्रनाइज़ेशन केवल अभ्यास के साथ हासिल किया जाता है। समूह प्रदर्शन एक विशेष नर्तक को पेश करने के बारे में नहीं है यह नर्तकियों के बीच एक समूह के समन्वय और समझ के बारे में है यह सब सही समय के बारे में है कभी-कभी नर्तक, गीत और पोशाक बहुत बढ़िया होते हैं, लेकिन खराब सिंक्रनाइज़ेशन परफॉर्मेंस के सारे आकर्षण को खत्म कर देता है। मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान कहती हैं,
"शुरुआत की तरह अभ्यास करें, और एक विशेषज्ञ की तरह प्रदर्शन करें"
बिना कोई समझौता या अति आत्मविश्वास के बिना ईमानदारी से अभ्यास करें व प्रदर्शन करते समय
अपने प्रदर्शन को हाई लेवल के परफॉर्मेंस की तरह प्रस्तुत करें।
नृत्य के लिये पोशाक का चुनाव
कॉस्टयूम प्रदर्शन और नर्तकी के व्यक्तित्व के लिए चमत्कृत कर सकता है तो बिगाड़ भी सकता है। सही कपड़े, रंग, मेक-अप, गहने चुनना एक महत्वपूर्ण निर्णय है। हमेशा अच्छे कॉम्बिनेशन का उपयोग करें प्रभावी होने के लिए। जैसे कि पीले और लाल रंग की तरह का कॉम्बिनेशन। काले, भूरा, और सुनहरे रंग का कॉम्बिनेशन एक साथ न करें जब तक कि चरित्र की आवश्यकता न हो।
नृत्यांगना का मेकअप
मेकअप एक जरूरी चिज है जो चेहरे की अभिव्यक्ति को दर्शकों तक पहुंचने में मदद करता है।अगर बहुत बड़ी संख्या में दर्शक हो और मंच काफी बड़ा हो तब श्रृंगार भव्य होना चाहिए ताकि एक विशाल ऑडिटोरियम की अंतिम पंक्ति में एक व्यक्ति आपके भाव देख सकें। अपने बाल शैम्पू करें और उन्हें सूखा ही बांधे। ऑइली बाल मेकअप को प्रभावित करते हैं और बालों की शैली को प्रभावित करते हैं।
हमेशा कुछ प्रामाणिक वेशभूषा पहनें। थीम के साथ क्रिएटिव वेशभूषा भी काम करेगी। एक पूरी तरह से फिट पोशाक शरीर के पोस्चर को स्पष्ट करेगी। आंदोलनों स्पष्ट रूप से नजर आएंगे।याद रखें खराब पोशाक वाले एक अच्छे नर्तक की प्रशंसा कभी नहीं की जाएगी।मेकअप के नाम पर खुद को म्यूजियम न बनाएं। कम से कम सामान का उपयोग करें। खुद को बहुत गहने या अतिरिक्त बालों के साथ बोझिल मत बना लें, जो आपको परेशानी में डाल दें। पोशाक पर सेफ्टी पिनों को सावधानी से उपयोग करें, अन्यथा यह नृत्य करने के दौरान खुल सकता है और आपको चोट पहुंचा सकता है।
मेरी सलाह है कि छात्राओं को लहंगे के नीचे एक काले रंग की लेग्गिंग्स अवश्य पहनें।प्रदर्शन से पहले पोशाक का अभ्यास करना हमेशा उचित होता है।
नृत्य और मंच की व्यवस्था देखना
यदि नृत्य एक रिकॉर्ड किए गए संगीत के साथ किया जाता है तो देखें कि आपने अभ्यास के लिए गीत की दो प्रतियां रखी है या नही इससे आप हमेशा फायदे में रहेंगे।
यदि गाना दूसरे नंबर पर है मेमोरी में तो आखिरी मिनट की भ्रम से बचने के लिए इसे अपने गीत में सेट करें सही गीत संख्या के साथ चिह्नित करें ताकि तकनीशियन को किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता न हो। यदि आपको मौका मिलता है, तो अपने प्रदर्शन से पहले मंच पर जाएं कि यह देखने के लिए कि क्या मंच का फर्श स्थिर और चिकना है, अन्यथा आपको सावधान रहना होगा। अपने शो से कम से कम आधे घंटे पहले तक पोशाक और पूर्ण मेकअप के साथ तैयार हो जाइये। फिर दिमाग स्थिर करें और अपने आप को आराम करने की कोशिश करें। आप अपनी आंखों के साथ 5 मिनट का श्वास व्यायाम कर सकते हैं। बैकस्टेज के ग्रीन रूम में विचलित न होने की कोशिश करें आपके द्वारा पहले से हो रही किसी और कलाकार की किसी भी प्रदर्शन को देखने के लिए परेशान न करें ऐसा करने से आप परफॉर्मेंस में भ्रमित हो जाएंगे खुद को समझने और केंद्रित रखने के लिए यह जरूरी है।
आपके प्रदर्शन से पहले
शुरू होने से पहले नमस्कार करो। यह उन सभी लोगों के आशीर्वाद का आह्वान करना है जिन्होंने आपकी पूरी प्रक्रिया में सहायता की है। यदि आपके पास मंच का डर है तो दर्शकों को न देखें। बस अपने नृत्य पर ध्यान केंद्रित करें अपने हाथों में देखो जैसा कि आप करते हैं। मंच पर खुद को भूल जाओ स्वयं जागरूक होने के कारण ध्यान कम हो जाता है कोई फर्क नहीं पड़ता अगर आपकी बाली गिरती है, या अतिरिक्त बाल ढीले हो रहे हैं। बस नृत्य करना मेरा काम ​​है और वही करें।
धन्यवाद।

गुरुवार, 29 जून 2017

ऑनलाइन कत्थक सीखें-2

                         चैप्टर-2
व्यायाम
कथक नृत्य को सीखने में आपका स्वास्थ आपके सीखने पर असर डाल सकता है । जरुरी है कि आप स्वस्थ रहें और लगातार नृत्य करने की शक्ति आपके पास हो,ताकि आप अच्छी तरह और देर तक प्रेक्टिस कर सके। नृत्य करने के अंगो का भी हम व्यायाम में प्रयोग कर सकते है,ताकि उनका लचीलापन बढ़े। और नृत्य में प्रयोग करने में कोई कठिनाई ना आए।सबसे पहले अपनी आंखों से शुरु करें ।
आंखों का व्यायाम
1.आंखों की पुतलियों को दाहिने और बाएं बारी-बारी से घुमाए।
2. ऊपर और नीचे देखने का प्रयास करें ।
3.Diagonal तरीके से घुमाएं। पहले सामने से दाहिने, दाहिने से ऊपर,ऊपर से बाएं,बाएं से नीचे,नीचे से सामान्य। फिर इसका उल्टा करे।
गर्दन का व्यायाम
गर्दन को पहले बार घुमाकर अपने काम को कंधों में सताए फिर दाहिने सताए ऐसा कर हमसे जितनी बार कर सके करें चेहरे कीथोड़ी नीचे करें फिर ऊपर छत देखें यानी गर्दन को ऊपर और फिर नीचे करें गर्दन को बुलाई में घुमाइए गर्दन को पहले जो कहा है उसेऊपर छत देखें फिर बाएं कंधे की ओर जाते हुए फिर नीचे झुकाएंऐसा पहले घर घड़ी की दिशा में करें फिर घड़ी की उलटी दिशा मेंकरें गर्दन आगे पीछे करें जैसे पक्षी करते हैं फिर इसका दूसरा प्रकार में पहले दाहिने देखें फिर सामने और फिर बाय देखें इसका उल्टा करें या नहीं पहले बाय देखें फिर सामने की तरफ देखें और फिर दाहिने देखें
कमर का व्यायाम
1.कमर को पहले दाहिने उठाएं,फिर बाएं। ऐसा क्रम से करते रहें।
2.कमर को दाहिने से गोलाई में घुमायें। फिर बाए तरफ से गोलाईमें घूमाए ।
3.कमर के पार्श्व भाग को ऊपर उठाएं फिर इसे सामान्य करें।
कत्थक नृत्य में ज्यादातर पैरों का इस्तेमाल होता है ततकार करने में। अतः पैर के खिंचाव वाले व्यायाम अवश्य करें।
पैरो के लिए व्यायाम
◆ सर्वहितआसन-इसमें अपना एक पैर घुटनों से मोड़े फिर दोनों हाथों से घुटनों को सहारा देते हुए अपने सीने पर घुटना स्पर्श करने की कोशिश करें। यह आसान करने से पैरों में स्थिरता बढ़ती है।
◆ नटराज आसन- इसमें आप दाये पैर को पीछे से उठाकर घुटनों से मोड़े फिर पीछे से दाएं हाथ से पैर के पंजे पकड़े और दूसरा हाथ सामने फैला दें । एक पैर से संतुलन बनाए। सिर सीधा रखें। इसे दूसरे पैरों से भी करें।बशारीरिक स्थिरता और मानसिक एकाग्रता के लिए यह आसन काफी लाभ प्रद है ।
◆ शिरंगुष्ठासन- इसमें आपको अपने सिर से पैरों के अंगूठे को छुना है दूसरा पैर पीछे की ओर सीधे जमीन पर फैला हुआ रहेगा। और दोनों हाथ पीठ पर बंधे हुए रहेंगे।
◆ उतान पादासन-पीठ के बल भूमि पर चित्त लेट जाएं। दोनो हथेलियों को भूमि स्पर्श करने दें। दोनों पैरों को सटाएं हुए धीरे धीरे ऊपर उठाएं। जितनी देर रोक सकते हैं रोके फिर श्वास छोड़ते हुए नीचे करें। इस व्यायाम का जिक्र लक्ष्मी नारायण गर्ग द्वारा लिखित किताब "कत्थक नृत्य" में है। 
◆ पादहस्तासन- इस आसान को करने के लिए नृत्य के समपाद मुद्रा में खड़े हो जाए। दोनों हाथ ऊपर उठाएं, सांस भरे और कमर से धीरे-धीरे झुकते हुए सामने से अंगूठे को छुए। ध्यान रहे घुटना मुड़ना नहीं चाहिए।अब सांस छोड़ते हुए वापस सीधे खड़े हो जाए। यह आसन पैरों के साथ-साथ जांघ और कमर के लिए भी सर्वोत्तम है।
◆ प्राणायाम- मानसिक शक्ति को बढ़ाने के लिए आप प्राणायाम अवश्य करें। इससे आपकी स्मरण शक्ति तीव्र होगी,जो कत्थक में काफी लाभप्रद होगी। किसी भी आसन में बैठ जाइए, और आंखें बंद करके गहरी सांस लीजिए। सांस लेने और छोड़ने की गति धीमी हो। मन को विचार मुक्त रखिए और शरीर को तनाव मुक्त महसुस कीजिए। यह बहुत आसान है पर कई गुणा लाभप्रद है।
◆ शवासन- नृत्य आरंभ करने से पूर्व या सुबह में इन सभी व्यायाम को करने की आदत डालें। जो 24 घंटे में एक बार काफी है, पर नृत्य में हर रियाज समाप्ति पर या स्टेज परफॉर्मेंस के बाद शवासन करना जरुरी है। इसे करने से नृत्य करने के दौरान आपकी शरीर की गई ऊर्जा वापस आती है। नृत्य करने के पश्चात आप जमीन पर सीधे लेट जाइए,हाथ और पैर को पूरी तरह ढ़ीला/निढाल छोड़ दीजिए, और गहरी सांस लीजिए। 20 मिनट इसी स्थिति में ही लेटेे रहिए। आप इसके बाद काफी उर्जावान महसूस करेंगे।

बुधवार, 28 जून 2017

ऑनलाइन कत्थक सीखें 1

चैप्टर-1
प्रणाम/नमस्कार
कथक में अभिवादन को सलामी या नमस्कार कहते हैं. इसी से नृत्य प्रारंभ होता है. वैसे तो कथक में प्रणाम,नमस्कार,सलामी का बड़ा स्वरूप है. नृत्य पर मुगलों के प्रभाव से सलामी तोड़ेे नाचे जाते थे और वर्तमान में हिंदुओं का प्रभाव होने से सलामी तोड़ो की जगह बहुतायत में नमस्कार और गुरु या ईश वंदना ने ले ली है. यहां मैं नमस्कार/सलामी,तोड़ो से करने की बात नहीं कर रही हूं.सबसे पहला प्रणाम जो नृत्य के रियाज के समय या शिक्षा ग्रहण करने के समय किया जाता है,मैं उस प्रणाम के बारे में बता रही हूं.
जब भी आप रियाज करें तो उसके पहले प्रणाम करें, और नृत्य समाप्ति पर भी प्रणाम करें. यह प्रणाम आप मंच पर नृत्य आरंभ करने से पहले भी करें. सलामी,नमस्कार और वंदना के बारे में आगे के चैप्टर में बात होगी.
■उत्पत्ति स्थान पर शिखर हस्तमुद्रा बनाएं. फिर कंधे से गोल घुमाते हुए पंजों पर संतुलन बनाते हुए बैठे,फिर पहले मंच/फर्श पर हाथों से पताका मुद्रा बनाते हुए स्पर्श करें. इसके बाद पताका मुद्रा बनाते हुए अपनी पलकों को स्पर्श करें. यह हमारा मातृभूमि के लिए सम्मान हुआ.
■पलको को छूते समय सीधे खड़े हो जाएं. पैरों की स्थिति समपाद में होगी. फिर सबसे पहले सर के ऊपर पुष्पम बनाते हुए भगवान को प्रणाम करें.
■अंत में कंधों से हाथों को घुमाकर उत्पत्ति स्थान पर अंजलि की मुद्रा बनाकर प्रणाम करें. यह प्रणाम गुरु के लिए हुआ.अगर आप मंच पर प्रस्तुति दे रहे हैं तो गुरु के लिए और दर्शक दोनों के लिए है. बस दर्शक के लिए अंजली मुद्रा बनाए हुए हाथों को बाईं कंधे की तरफ से दाहिने कंधे की ओर लाकर उत्पत्ति स्थान पर प्रणाम करना है.

बुधवार, 21 जून 2017

प्राणायाम और कथक

योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। योग करने से शारीरिक और मानसिक स्थितियों में जुड़ाव होता है,जिससे मन शांत और स्थिर होता है। बिल्कुल यही चीज का अनुभव हमें कत्थक में भी होता है। इस नृत्य में शरीर और मन को एक लय में रखते हैं और आत्मिक सुख की अनुभूति प्राप्त करते हैं। योग और कत्थक दोनों का अपना ही शास्त्र है। वैसे तो योग और कथक की परिभाषा करना कठिन कार्य है, और साथ ही इन विद्याओं को साधना भी अत्यंत कठिन है। प्रत्येक प्रसंग का विस्तार पूर्वक अध्ययन संभव नहीं।
बौद्ध धर्म के अनुसार कहा गया है "कुशल चितैकग्गत योगः" अर्थात कुशल चित्त की एकाग्रता योग है।


कथक के नवीनतम सूफी कथक के विकास में भारतीय योग का काफी प्रभाव है। इन दोनों में ही शारीरिक मुद्राओं यानी आसन और श्वास नियंत्रण यानी प्रणायाम को अनुकूलित किया है। वैसे आप कैसे लाभ में योगासन और प्राणायाम द्वारा कत्थक नृत्य में?? पिछले आर्टिकल "प्राणायाम से बढाये अपने नृत्य प्रदर्शन की शक्ति"  मैं मैंने प्राणायाम से मानसिक शक्ति को प्रबल बनाने को कहा था। लक्ष्मीनारायण गर्ग द्वारा रचित किताब कत्थक नृत्य में भी रूप सौंदर्य चैप्टर में व्यायाम और प्राणायम की आवश्यकता कत्थक नृत्य के लिए बताई गई है।
योगासनों से कत्थक में लाभ
कत्थक नृत्य में सिद्धहस्त होने के लिए बहुत छोटी बड़ी चीजों की आवश्यकता है। शारीरिक स्तर पर एक कुशल नर्तक में कुछ चीजें हो जिसमें आपका खूबसूरत और लचीला शरीर ,सुंदर चमकती त्वचा, अच्छा स्वास्थ्य ,आदर्श वजन( कृशकाय शरीर या भारी शरीर दोनों ही कथक नृत्य के लिए सही नहीं है) होनी चाहिए। वही मानसिक स्तर पर आत्म विश्वास, याददाश्त, सुंदर विचार, प्रभावशाली वाणी, शांति, खुशी और ऊर्जा होनी चाहिए। शारीरिक और मानसिक स्तर पर इन जरूरी गुणों को पूर्ण करने का काम योगाभ्यास और प्राणायाम करते हैं। योग में कई आसान है जिन्हें आप करें तो शारीरिक रूप से आप समृद्ध होंगे  और ऊपर लिखित सभी चीजें या उससे कहीं ज्यादा फायदा आपको मिलेगा। वहीं प्रणायाम से आप अपना आत्मिक विकास कर सकते हैं। आप अपनी आत्मा को पवित्र करने की कोशिश करेंगे तो स्वतः आप आत्मविश्वासी और वाणी से प्रतिभाशाली होंगे। आपका मन शांत होने से याददास्त अच्छी होगी और आप एक विनम्र नृत्य के कलाकार बन सकेंगे।
योग और कथक नृत्य मुद्राओं की समानता
मुद्रा : जहां योग में मुद्रा एक प्रतीकात्मक किया अनुष्ठानिक भाव-भंगिमा है। वही शास्त्रीय नृत्य में  मुद्रा (gesture) यानी हस्त मुद्रा जैसे शब्द का प्रयोग किया जाता है। कथक नृत्य में मुद्राएं दो प्रकार की है पहली असंयुक्त मुद्रा जो 24 है,और दूसरी संयुक्त मुद्रा जो 13 है। आमतौर पर दोनों हाथों से और उंगलियों से मुद्राएं बनती है। योग मुद्रा में जो ब्रह्म मुद्रा में हाथों से मुद्रा बनती है। उसकी समानता कत्थक में पल्लव मुद्रा के समान है। कत्थक नृत्य की पताका मुद्रा योग के अभय मुद्रा से मिलती-जुलती है। योग में इसका अर्थ सुरक्षा, शांति, परोपकार, तथा भय को दूर करने वाला का प्रतिनिधित्व करता है। वही पताका मुद्रा में भीड़,वर्षा,रात्रि ,गर्मी इत्यादि को दिखाया जाता है। योग में एक और मुद्रा है जिसका नाम है पृथ्वी मुद्रा या मुद्रा कत्थक की मयूर मुद्रा के समान होती है पृथ्वी मुद्रा करने से गैस, गला, आंख इत्यादि के रोगों में लाभ मिलता है तथा खूबसूरती बढ़ती है चेहरे में चमक आती है। नृत्य के मयूर मुद्रा से मयूर,लता,बिंदी,आंसू इत्यादि का अर्थ दिखाने के लिए मयूर हस्त मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। बनते दोनो एक ही तरीके से है पर दोनों का अर्थ और प्रभाव अपने क्षेत्र में अलग -अलग है। योग के करण मुद्रा के समान ही कथक नृत्य ।में सिंहमुख मुद्रा बनती है।जहाँ योग में करण मुद्रा का प्रयोग करने से यह बीमारी और नकारात्मक विचारों को दूर करती है।पर यह मुद्रा पूरी तरह सिंहमुख मुद्रा के समकक्ष नही बनती है, क्योकि पश्चिमी देशों में करण मुद्रा अनामिका और मध्यमा उंगलियो को मोड़कर बनती है बाकी उंगलिया सीधी तनी हुई होती है, जबकि कुछ देशों में यह मुद्रा सिंहमुख मुद्रा समान अनामिका मध्यमा के साथ अंगूठा भी मुडा होता है। सिंहमुख मुद्रा से हम शेर का चेहरा,अग्नि,हाथी,खुशबू,घास,फूल इत्यादि को दर्शाते है।
         यह तो हुई कुछ चन्द मुद्राएं जो योग में समान रुप से बनाई जाती है और अपने अपने क्षेत्र में लाभ देती है। एक विस्तृत अध्ययन करने पर हो सकता है हमें ऐसे बहुत से साम्य और लाभ  देखने को मिलें। इस आर्टिकल में कुछ त्रुटिया हो सकती है इसके लिए मुझे क्षमा करेंगे। परंतु अपने विचारों से मुझे अवगत अवश्य कराएं ।
धन्यवाद।

बुधवार, 14 जून 2017

कुछ अनोखापन है आपके नृत्य में?

क्या आप नृत्य की शिक्षा ले रहे हैं? तो यह आर्टिकल आपके लिए है... जिस तरह आप अपने फ्यूचर की प्लानिंग करते हैं वैसे ही जिस विषय कि आप शिक्षा ले रहे हैं उसमें आप विशेषज्ञ बन सके उसके लिए भी प्लानिंग करनी जरूरी है।नृत्य सीखने के दौरान सिर्फ सीखते जाना सही है,ऐसा कर आप अपने गुरु की नजरों में एक काबिल छात्र या छात्रा बन जाते हैं।सिखाये हुए सभी तोड़े,टुकड़ों को सही से प्रस्तुत करना और उन्हें ताल के अंतर्गत गिनकर सम पर लाना,अपने पाठ्यक्रम के सारे तालों को जानना, उन्हें कई विभिन्न नए लयकारिओं में प्रस्तुत करना और नियमित रियाज करना। अगर आप यह सारे कार्य जानते हैं,तो निश्चय ही आप बेहतर विद्यार्थी हैं नृत्य के।

पर क्या इतना काफी है? इससे आप एक अच्छे नृत्य के जानकार बन सकते हैं,और बेहतर नृत्य गुरु बन सकते है।  अगर आपके नृत्य प्रस्तुतीकरण का ढंग प्रभावशाली है तो मंच के  प्रतिष्ठित कलाकार बन सकते हैं। पर क्या आपको नहीं लगता कि 134 करोड़ के भारत की आबादी में आपके जितना मेहनत करने वाले लाखों कत्थक के विद्यार्थी होंगे,जो पहले से मौजूद बेहतर नृत्य शिक्षा और मंच के कलाकार से बेहतर बनने का प्रयास नहीं कर रहे होंगे? आप दुनिया की नजर में आना चाहते हैं तो कुछ अनोखा कीजिए। जरूरत सिर्फ रियाज करते जाने की नहीं है। आप खुद को किस तरह के  कलाकार के रूप में देखना चाहते हैं यह समझने की जरूरत है। वह अनोखापन खुद में ढूंढने की जरूरत है जो किसी दूसरे कलाकार में ना हो। कोई एक ही चीज बार-बार क्यों देखेगा! आप क्या शॉपिंग करने जाते हैं, तो पहले से मौजूद ड्रेस जैसी ही दूसरी खोज कर खरीदते हैं...!! नहीं ना? बल्कि आपकी कोशिश यही रहती है कि जो भी ड्रेस ले वह अच्छी हो,और सबसे अलग दिखे। पर सवाल यह है कि अनोखापन लाने के लिए क्या करना होगा। यहां मैं कुछ टिप्स लिख रही हूं जो आपने अनोखापन पैदा करने में मदद करेगा। और कुछ चीजें जो मैं आपके अंदर क्या खूबी है नहीं जानने की वजह से नहीं बता पाऊंगी..उन्हें आप खुद ढूंढने का प्रयास कीजिएगा।
ततकार-कथक नृत्य में ततकार सबसे पहले सीखने वाली विद्या है इसका आप नियमित कम-से-कम एक घंटा रियाज करें। और तरह-तरह की लयकारिया प्रस्तुत करें। मैंने अपने विद्यार्थियों से बात की जो नियमित एक घंटा सिर्फ ततकार की रियाज करते हैं,लेकिन सिर्फ तीन ताल में ता थेई थेई तत आ थेई थेई तत! ....ऐसा करने का कोई फायदा नहीं,आप बस इसे ऐसे करें कि 1 घंटे में समय बांट दें और कुछ समय तीन ताल में पहले विभिन्न लयकरियाँ करें। फिर कुछ समय तक पैरों को सादा 8गुन या 16 गुन में संचालित करें। और बाकी बचे समय में दूसरे ताल की भी लयकारियाँ करें। याद रखें ताल बहुत सारे हैं और आप हर ताल के तत्कार में एक 1-1 घंटे नहीं दे सकते, इसलिए 1 घंटे में सिर्फ दो ताल की तत्कार ही करें।
हस्तक - तत्कार के बाद बारी आएगी हस्तक में सुधार की। हस्तक में मुद्राओं का समावेश होता है। जिसमें आप संयुक्त और असंयुक्त मुद्राओं का प्रयोग करते हुए तीन ताल में सभी हस्तक एक के बाद एक विभिन्न लयों में करें। हस्तक में सुधार के लिए आप सभी हस्तक एक बार अपने गुरु के सामने जरुर करें और दिखा कर पूछ ले कि कहां-कहां और क्या-क्या कर गड़बडिया है। फिर उन्हें एक-एक कर सुधारे। याद रखें आपकी गड़बड़ियां एक सही गुरु ही आपको बताएगा। यह बात मैंने अपने पिछले आर्टिकल में भी कही है “क्या सही गुरु से ले रहे हैं आप नृत्य की शिक्षा”। अधिकांशतः कथक के विद्यार्थियों का हस्तक करने के दौरान या तो कंधे लटके होते हैं या  कोहनिया नीचे की ओर झुकी होती है। और पूरे शरीर का पोस्टर बेढंगा होता है। कत्थक में कई ढंग और तरीके के हस्तक होते हैं,आपको सभी हस्तक पूरे मनोयोग से और बारीकी से सीखने और करने चाहिए। जितनी मेहनत आप हस्तक पर करेंगे आपका नृत्य उतना ही बेहतर होगा।
चक्कर- अगर आप चाहते हैं कि सभी दर्शक आपको चमत्कृत होकर देखे तो चक्कर पर पकड़ अवश्य बनाएं। नृत्य में चक्कर ले पाना आसान नहीं होता। इसमें अगर आप सबसे अनोखा बनना चाहते हैं तो सिंपल एक का चक्कर से काम नहीं चलेगा। आपको एक बार में चार से पांच चक्कर लेने की कोशिश भी करनी होगी बिना उन चार या पांच चक्करो के बीच में पैर टिकाये या रखे। जितनी कोशिश आप बाईं तरफ से चक्कर लेने में करते हैं उतनी कोशिश दाईं तरफ के चक्कर पर भी पकड़ बनाने पर करें तो निश्चित ही आपके पास अनोखापन मौजूद हो जाएगा। क्योंकि कत्थक में सीधी चक्कर तो सभी लेते हैं पर उल्टी चक्कर लेना बहुत मुश्किल होता है। चक्कर पर पकड़ बनाने के लिए शारीरिक संतुलन काफी मायने रखता है शुरुआत में रियाज करते वक्त आप लड़खड़ा सकते हैं पर धीरे-धीरे कोशिश करते रहें तो लड़खड़ाना कम होगा और स्थिरता आती जाएगी। चक्कर एड़ी पर ही करें पंजों पर नहीं। एड़ी पर चक्कर लेने से चक्कर करने के दौरान आपका शरीर अप-डाउन नहीं करेगा। चार-पांच चक्कर करने में चौथे या तीसरे चक्कर पर एक बार पंजों का प्रयोग कर सकते हैं.

         .....इसी तरह और भी कई चीजें हैं जिसको एक आर्टिकल में समेटना संभव नहीं। आपको अनोखा नर्तक बनाने में कत्थक नृत्य में कई छोटी-बड़ी चीजें हैं जो आपको प्रेक्टिस करनी होगी। यह कथक के प्रति आपका समर्पण और तपस्या ही आप से करवा सकती है। मैं आगे की आर्टिकल में बाकि बाते बताऊंगी
            धन्यवाद।


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मंगलवार, 6 जून 2017

भगवान ने सबको 24 घंटे ही दिए हैं

जी हां भगवान ने तो सबको बराबर समय दिया है किसी से कोई भेदभाव नही किया । इन्ही 24 घंटो में दिन रात एक कर कोई अपना नाम रोशन कर जाते है,तो कोई जिंदगी में कुछ नहीं कर पाता बस simple  सी जिंदगी गुजार लेता है, अपने समस्याओं का रोना रोते हुए। सबसे बड़ा रोना यह कि मुझे अमुक काम करने का वक़्त ही नही मिला...! याद रखिये एक्सक्यूसेस जो आप औरो को दे रहें हैं वो सच में एक्सक्यूसेस नही है वह आप खुद को तस्सली देते हैं कि मेरे जीवन में कुछ न हासिल करने की वजह कोई और (समय की कमी) है ...मैं नही हूँ!!!
जबकि आप ध्यान दें तो पाएंगे कि कई बार तो यूँ ही समय बर्बाद होता है और आप उसे काम समझ कर करते चले जाते है। जी हां मेरा इशारा नेट सर्फिंग,चैटिंग , मैसेज इन जैसे गैर जरूरियात कामों की तरफ है जिनमें आपका एक अच्छा खासा वक्त बर्बाद होता है। कई बार तो आप समय फिक्स न रखने की वजह से भी समय को बर्बाद करते हैं,जैसे मॉर्निंग में अगर आपको उठना हो तो आपका समय अगर फिक्स ना हो। जैसे कि किसी दिन आपकी सुबह 6:00 बजे नींद खुल गई किसी दिन आप 4:00 बजे सुबह उठ गए। इस वजह से भी समय की काफी बर्बादी होती है,और आप कोई भी काम सही वक्त पर पूरा नहीं कर पाते या आपके कई सारे काम अधूरे छूट जाते हैं। वजह यही है कि आपका समय किसी भी काम के लिए निर्धारित नहीं है।
आपको हर काम के लिए समय मिले या समय कम न पड़े, इसके लिए जरूरी है कि

●आप अपने आप को punctual करें । आप अपने दैनिक कार्यों को निर्धारित समय पर समाप्त करें । जो काम आपके हिसाब से हो सके उन कामों को एक निश्चित अवधि में और नियमित उसी समय पर खत्म करने की कोशिश करें जिस समय पर आप इसे रोज कर सकें। इसमें आपके डेली रूटीन के काम आ सकते हैं, नहाना, ब्रश करना,कपडे आयरन करना,घर की साफ-सफाई करना,खाना बनाना वगैरह- वगैरह।
● नेट सर्फिंग चैटिंग आदि को नियमित समय अवधि के लिए खाली समय में करें, जैसे कि जब आपको हल्का आराम करने का मन करें।जरूरी नहीं की किसी ने आप को मैसेज किया है तो उसी वक्त रिप्लाई देना पड़े,बाद में भी जरूरी बातें लिखकर उसे सेंड करें और जो भी क्वेश्चन जानना चाहते हो या पूछना चाहते हों उसे लिखकर छोड़ दो। अगर रिप्लाई मांगना तुरंत जरूरी हो तो फोन से बात कर ले।
● जो भी चीजें आप अलग से करना चाहते हैं जो आपके लॉन्ग टर्म के ड्रीम हो सकते है। उन्हें आप कितने साल बाद अपनी लाइफ में हासिल कर लेना चाहते हैं। यह निर्धारित करते हुए उतनी अवधि का एक प्लान तैयार करें और फिर उस पर काम करें। याद रखिए जरूरी नहीं कि हमें अपने सपने को पाने के लिए खरगोश की भांति दौड़ना पड़ेगा तभी वह हमारी लाइफ में आएगा। हम कछुए की तरह चलकर भी अपने सपने को पूरा कर सकते हैं।
● कभी-कभी हम अनचाहे रूप से दूसरों के काम में उलझे रह जाते हैं, और हमारे अपने काम के लिए वक्त नहीं मिलता।अगर आपके साथ ऐसा है तो आप खुल कर बोलना सीखें। अगर आप सही में उस काम को नहीं करना चाहते तो 'ना' कहें। शुरू में प्रॉब्लम आएगी पर अगर आपने अपनी बात क्लियर कर दी तो सामने वाला आपकी बात जरूर समझेगा।
● कभी-कभी यह भी होता है कि सारा काम खुद करने के चक्कर में हम अनचाहे रूप से बेफजूल के काम मे उलझे रहते हैं। जो काम सिर्फ आप ही कर सकते हैं, उसे स्वयं करें। जो उतना महत्वपूर्ण काम नहीं है उसे करने में दूसरों की मदद अवश्य लें। इससे आपका काम आसान हो जाएगा और समय भी बचेगा।
● याद रखिए लाइफ में आपका ड्रीम क्लियर होना चाहिए।अगर आपका जीवन में लक्ष्य क्लियर है,तो बस उस पर दृढ़ रहिए और निरंतर रूप से उस पर काम करते रहिए आपका लक्ष्य जरुर पूरा होगा।