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शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

ऑनलाइन कत्थक- 4

कत्थक एक भारतीय शास्त्रीय नृत्य है यह उत्तरी भारत से उत्पन्न हुआ और यह भारतीय संस्कृति में आठ शास्त्रीय नृत्य रूपों का हिस्सा है जो प्राचीन भारत के उत्तरी क्षेत्र में खासकर प्रचलित थी। कत्थक नृत्य नाम पड़ा कथक जाति के लोगो के नाम पर कथक जाति के लोग बड़े मंदिरों में अपने प्रदर्शन को प्रदर्शित करने के लिए श्री विशेष रुप से पौराणिक पात्रों की कहानियां और प्रासंगिकता के साथ वाली कहानियों को धार्मिक शास्त्रों से लेकर लोगों के बीच प्रदर्शित करते थे।ये अपनी कहानियां हाथ और शरीर के मुद्राओं और इशारों से प्रस्तुत करते थे। उनकी अभिव्यक्तियों में चेहरे पर आस्था के भाव से वह अधिक सम्मोहक और भीड़ खींचने में सक्षम थे। वह कथाओं को संगीत और नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करते थे।
कथक के वर्तमान रूप में आज कई तरह के कई विशेषताओं को शामिल किया गया था। इसमें कुछ बदलाव भक्ति आंदोलन के द्वारा हुए। 16वीं शताब्दी के दौरान कत्थक नृत्य द्वारा श्याम को सूचित किया गया था, जबकि मुगल युग के दौरान मध्य एशियाई नृत्य प्रभाव को नृत्य में शामिल किया गया था। अभी मुख्य रूप से 3 घराने हैं जो कथक के कलाकारों की वंशावली को निर्धारित करते हैं। यह घराने हैं ।
लखनऊ घराना
जयपुर घराना और
बनारस घराना।
जयपुर घराना राजपूत के राजाओं की अदालतों से बाहर पैदा हुआ था। नवाबों की वजह से लखनऊ घराना और बनारस के नवाबों के कारण बनारस कथक के घराने का उदय हुआ था।
कत्थक का यह वर्तमान रूप अपने इतिहास के दौरान अवशोषित विभिन्न प्रभाव का एक मिश्रण है। इसका मतलब यह है कि मंदिर पौराणिक और धार्मिक पहलुओं के साथ रोमांटिक और श्रृंगार के साथ कई तरह के पहलुओं को यह नृत्य प्रस्तुत करता है। कत्थक की पहचान इसके पदाघातों से होती है जो इसकी सबसे बड़ी खासियत भी है, जिसे हम ततकार कहते हैं। इस नृत्य शैली में घुँघरू की ध्वनि की ओर अधिक ध्यान दिया गया है।कत्थक नृत्य करने के लिए आपको घुँघरू पर पूरा अधिकार होना चाहिए और उसके लिए आपको निरंतर अभ्यास करना पड़ेगा। ज्यादा अच्छा है कि आप अभ्यास तबला के साथ करें या  लहरा के साथ। आज कल कई ऐप्प मौजूद हैं लहरा के जो आपके काफी काम आ सकती हैं। तत्कार के पैर में विभिन्नता लाने के लिए आपको कुछ अलग तरह के बोल रचनाओं का अभ्यास करना होगा। पिछले पाठ्यक्रम में हमने सीखा था कि तत्कार कैसे करना है । आज कुछ पदघातों का समूह नीचे दे रही हूं जिनका नित्यप्रति अभ्यास करें । यह पदघातों का समूह लक्ष्मी नारायण गर्ग द्वारा लिखी पुस्तक कथक नृत्य से लिया गया है। पैरो से दा यानि दायां पैर को सूचित किया गया है और बा यानि बायां पैर सूचित किया गया है।

1. दा बा दा बा, दा बा दा बा, दा बा दा बा, दा बा दा बा ।

2.बा दा बा दा, बा दा बा दा, बा दा बा दा, बा दा बा दा ।

3.दा बा दा दा, बा दा बा बा, दा बा दा दा, बा दा बा बा ।

4. दा बा दा, दा बा दा, दा बा - दो बार

5. बा दा बा, बा दा बा, बा दा - दो बार

6. दा बा दा बा, दा दा दा बा - दो बार

7.बा दा बा दा, बा बा बा दा - दो बार

8. दा बा बा दा, दा बा बा दा - दो बार

9.दा बा -- दा, दा बा -- दा - दो बार

10.बा दा -- बा , बा दा -- बा - दो बार

शनिवार, 26 अगस्त 2017

तालों में विभिन्न लयकारियाँ लिखने का तरीका

यहां मैं आपको तीनताल के माध्यम से बताउंगी कि तरह-तरह की लयकारियों को कैसे लिखें।सबसे पहले ठाह लय को तीनताल में समझिये। तीनताल में कुल १६ मात्राएँ और ४ विभाग होतें हैं, जिसमे ३ तालियां पहली,पांचवी और तेरहवी मात्रा पर आती है. तथा खाली नवी मात्र पर दिखाई जाती है . निचे तीनताल की ठाह लय लिपिबद्ध किया गया है जिसका चित्र निम्न हैं .
ठाह लय तीनताल 
अब हमें तीनताल की दुगुन को लिपिबद्ध करना है.इसके लिए सबसे पहले तीनताल के पुरे आवर्तन को दो बार बिना विभाग लगाये या कोई मात्र लगाये दो बार लिख लेंगे.फिर जैसे ठाह लय में एक मात्रा में एक बोल को लिखा गया है वैसे ही दुगुन लय के लिए एक मात्रा में दो बोल लिखेंगे और उसे निचे से अर्ध चंद्राकर चिन्ह से घेर देंगे.  जैसे चित्र में है ―›  (  ͜  ) दुगुन लय के लिए चित्र को देखें....
दुगुन लय तीनताल 
अब तीनताल की दुगुन के बाद तीनताल की तिगुन को लिपिबद्ध करना है. जैसे दुगुन में हमने एक मात्र में दो बोल को चंद्राकर चिन्ह से घेरा वैसे ही तिगुन में एक मात्रा में तिन बोलों को चंद्राकर में घेरना है. इसके लिए सबसे पहले तीनताल के पुरे आवर्तन को तीन बार बिना विभाग लगाये या कोई मात्र लगाये लिख लेंगे. और तिन बोलों को चंद्राकर में घेरते हुये मात्रा और ताली खाली का चिन्ह लगा कर विभाग बाँट देंगे. तिगुन लय के लिए चित्र को देखें....
तिगुन लय तीनताल
अब तीनताल की तिगुन के बाद तीनताल की चौगुन को लिपिबद्ध करना है. जैसे दुगुन में हमने एक मात्र में दो बोल को चंद्राकर चिन्ह से घेरा वैसे ही चौगुन में एक मात्रा में चार बोलों को चंद्राकर में घेरना है. इसके लिए सबसे पहले तीनताल के पुरे आवर्तन को चार बार बिना विभाग लगाये या कोई मात्र लगाये लिख लेंगे. और चार-चार बोलों को चंद्राकर में घेरते हुये मात्रा और ताली खाली का चिन्ह लगा कर विभाग बाँट देंगे.चौगुन लय के लिए चित्र को देखें....
चौगुन लय तीनताल 
इसी तरह हम किसी भी ताल की दुगुन तिगुन या चौगुन लय उपरोक्त विधि से बना सकते हैं .

बुधवार, 12 जुलाई 2017

ऑनलाइन कत्थक सीखें-3

                           चैप्टर 3
ततकार
ततकार शब्द की परिभाषिक व्याख्या कत्थक नृत्य के संदर्भ में करें तो पैर के तलवे द्वारा भूमि पर प्रहार या आघात करने की क्रिया तत्कार कही जाती है। ता थेई थेई तत कत्थक नृत्य का ऐसा उदाहरण है जिस पर कथक नृत्य निर्भर करता है। इसके हजारों प्रस्तार किए जा सकते हैं। तत्कार शब्द 700 वर्षों से भी पुराना है। तत्कार के अभ्यास के लिए कुछ आवश्यक चीजें हैं, जैसे घूँघरू कैसा होना चाहिए या उनकी संख्या कितनी होनी चाहिये। उसके बाद खड़ा होने का तरीका, पद संचालन का तरीका तथा घूँघरू पर रियाज से अधिकार।
घुंघरू
कत्थक नृत्य शैली के जैसा घुंघरु का प्रयोग अन्य किसी नृत्य में नहीं है। कथक में घुंघरुओं की ध्वनि की ओर अधिक ध्यान दिया गया है।
          अभिनय दर्पण के रचयिता नंदी केश्वर के अनुसार घुंघरु काँसे का होना चाहिए वह उन सभी  घुँघरुओं की बनावट एक जैसी होनी चाहिए, उनकी ध्वनि में अंतर जरा सा भी न हो इसका ध्यान रखना चाहिए।
कत्थक की शुरुआत करते समय घुंघरु एक पैर में 100-100 होने चाहिए,बाद में 250-250 तक की संख्या बढ़ा लेनी चाहिए। पुराने घूँघरू महत्वपूर्ण माने गए हैं। घूँघरू की पीरोई जाने वाली डोरी शास्त्रकारों द्वारा नीला बताया गया है। घूँघरू को एक गांठ एक घूँघरू की पद्धति से बांध लेना चाहिए। घूँघरू को धागों के साथ में गांठ ना लगाएं इससे घूँघरू की आवाज दब जाएगी।
पद संचालन के लिए शारीरिक मुद्रा
पद संचालन करते वक्त सीधे खड़े हो जाए व दोनों हाथ को कलाइयों से मोड़ते हुए उनका पृष्ठ भाग कमर पर रखें। पैरों को स्वाभाविक स्थिति में रखकर उठाएं व आघात करें जिससे पैर का पूरा तलवा भूमि से स्पर्श करें। पद संचालन के लिए दूसरी मुद्रा है हाथ बांध कर खड़े होने की। व तीसरी मुद्रा है बाएं हाथ में दाहिना हाथ रख कर खड़े होने की। इस मुद्रा में हाथ का स्थान होगा उत्पत्ति स्थान से थोड़ा नीचे व पेट से थोड़ा ऊपर।
तत्कार कैसे करें
सबसे पहले यहां मैं तीनताल तत्कार करने का तरीका बताऊंगी। तीनताल में 16 मात्रायें होती है अतः इसके ततकार में 16 बार दोनों पैरों से बारी-बारी आघात करना होगा। पहली मात्रा पर दांया पैर मारे,दूसरी मात्रा पर बायां,तीसरी मात्रा पर पुनः दायां पैर और चौथी मात्रा पर बायां पैर मारे।
5वीं मात्रा से इसे उल्टा करें यानि 5वीं मात्रा पर बायां पैर,6ठी मात्रा पर दायां पैर मारे, 7वीं मात्रा पर बायां पैर और 8वीं मात्रा पर दायां पैर मारे।
9वीं मात्रा से 12वीं मात्रा तक 1हली मात्रा से 4थी मात्रा के अनुसार करें।व 13वीं मात्रा से 16वीं मात्रा तक 5वीं से 8वीं मात्रा के अनुसार करें। सम स्थान पर पुनः दाहिना पैर आएगा। नीचे ग्राफ से समझे पैरों को दाहिना (दा) और बायां (बा) से संबोधित किया गया है। काले रंग से तीनताल की मात्रा,हरे रंग से तीनताल के बोल,नीले रंग से कत्थक के तत्कार के बोल और पीले रंग से पैरों का सम्बोधन किया गया है। और लाल रंग से तीनताल की ताली व खाली का स्थान बताया गया है।
1      2      3      4
धा    धीं    धीं     धा
ता    थेई   थेई    तत
दा      बा     दा    बा
×
5        6      7      8  
धा       धीं    धीं     धा
आ      थेई    थेई    तत
बा       दा      बा     दा
9     10      11      12  
धा     तीं       तीं       ता
ता     थेई      थेई     तत
दा      बा       दा        बा
13     14      15     16B
ता       धीं      धीं       धा
आ      थेई     थेई      तत
बा       दा       बा      दा

गुरुवार, 29 जून 2017

ऑनलाइन कत्थक सीखें-2

                         चैप्टर-2
व्यायाम
कथक नृत्य को सीखने में आपका स्वास्थ आपके सीखने पर असर डाल सकता है । जरुरी है कि आप स्वस्थ रहें और लगातार नृत्य करने की शक्ति आपके पास हो,ताकि आप अच्छी तरह और देर तक प्रेक्टिस कर सके। नृत्य करने के अंगो का भी हम व्यायाम में प्रयोग कर सकते है,ताकि उनका लचीलापन बढ़े। और नृत्य में प्रयोग करने में कोई कठिनाई ना आए।सबसे पहले अपनी आंखों से शुरु करें ।
आंखों का व्यायाम
1.आंखों की पुतलियों को दाहिने और बाएं बारी-बारी से घुमाए।
2. ऊपर और नीचे देखने का प्रयास करें ।
3.Diagonal तरीके से घुमाएं। पहले सामने से दाहिने, दाहिने से ऊपर,ऊपर से बाएं,बाएं से नीचे,नीचे से सामान्य। फिर इसका उल्टा करे।
गर्दन का व्यायाम
गर्दन को पहले बार घुमाकर अपने काम को कंधों में सताए फिर दाहिने सताए ऐसा कर हमसे जितनी बार कर सके करें चेहरे कीथोड़ी नीचे करें फिर ऊपर छत देखें यानी गर्दन को ऊपर और फिर नीचे करें गर्दन को बुलाई में घुमाइए गर्दन को पहले जो कहा है उसेऊपर छत देखें फिर बाएं कंधे की ओर जाते हुए फिर नीचे झुकाएंऐसा पहले घर घड़ी की दिशा में करें फिर घड़ी की उलटी दिशा मेंकरें गर्दन आगे पीछे करें जैसे पक्षी करते हैं फिर इसका दूसरा प्रकार में पहले दाहिने देखें फिर सामने और फिर बाय देखें इसका उल्टा करें या नहीं पहले बाय देखें फिर सामने की तरफ देखें और फिर दाहिने देखें
कमर का व्यायाम
1.कमर को पहले दाहिने उठाएं,फिर बाएं। ऐसा क्रम से करते रहें।
2.कमर को दाहिने से गोलाई में घुमायें। फिर बाए तरफ से गोलाईमें घूमाए ।
3.कमर के पार्श्व भाग को ऊपर उठाएं फिर इसे सामान्य करें।
कत्थक नृत्य में ज्यादातर पैरों का इस्तेमाल होता है ततकार करने में। अतः पैर के खिंचाव वाले व्यायाम अवश्य करें।
पैरो के लिए व्यायाम
 सर्वहितआसन-इसमें अपना एक पैर घुटनों से मोड़े फिर दोनों हाथों से घुटनों को सहारा देते हुए अपने सीने पर घुटना स्पर्श करने की कोशिश करें। यह आसान करने से पैरों में स्थिरता बढ़ती है।
◆ नटराज आसन- इसमें आप दाये पैर को पीछे से उठाकर घुटनों से मोड़े फिर पीछे से दाएं हाथ से पैर के पंजे पकड़े और दूसरा हाथ सामने फैला दें । एक पैर से संतुलन बनाए। सिर सीधा रखें। इसे दूसरे पैरों से भी करें।बशारीरिक स्थिरता और मानसिक एकाग्रता के लिए यह आसन काफी लाभ प्रद है ।
◆ शिरंगुष्ठासन- इसमें आपको अपने सिर से पैरों के अंगूठे को छुना है दूसरा पैर पीछे की ओर सीधे जमीन पर फैला हुआ रहेगा। और दोनों हाथ पीठ पर बंधे हुए रहेंगे।
◆ उतान पादासन-पीठ के बल भूमि पर चित्त लेट जाएं। दोनो हथेलियों को भूमि स्पर्श करने दें। दोनों पैरों को सटाएं हुए धीरे धीरे ऊपर उठाएं। जितनी देर रोक सकते हैं रोके फिर श्वास छोड़ते हुए नीचे करें। इस व्यायाम का जिक्र लक्ष्मी नारायण गर्ग द्वारा लिखित किताब "कत्थक नृत्य" में है। 
◆ पादहस्तासन- इस आसान को करने के लिए नृत्य के समपाद मुद्रा में खड़े हो जाए। दोनों हाथ ऊपर उठाएं, सांस भरे और कमर से धीरे-धीरे झुकते हुए सामने से अंगूठे को छुए। ध्यान रहे घुटना मुड़ना नहीं चाहिए।अब सांस छोड़ते हुए वापस सीधे खड़े हो जाए। यह आसन पैरों के साथ-साथ जांघ और कमर के लिए भी सर्वोत्तम है।
◆ प्राणायाम- मानसिक शक्ति को बढ़ाने के लिए आप प्राणायाम अवश्य करें। इससे आपकी स्मरण शक्ति तीव्र होगी,जो कत्थक में काफी लाभप्रद होगी। किसी भी आसन में बैठ जाइए, और आंखें बंद करके गहरी सांस लीजिए। सांस लेने और छोड़ने की गति धीमी हो। मन को विचार मुक्त रखिए और शरीर को तनाव मुक्त महसुस कीजिए। यह बहुत आसान है पर कई गुणा लाभप्रद है।
◆ शवासन- नृत्य आरंभ करने से पूर्व या सुबह में इन सभी व्यायाम को करने की आदत डालें। जो 24 घंटे में एक बार काफी है, पर नृत्य में हर रियाज समाप्ति पर या स्टेज परफॉर्मेंस के बाद शवासन करना जरुरी है। इसे करने से नृत्य करने के दौरान आपकी शरीर की गई ऊर्जा वापस आती है। नृत्य करने के पश्चात आप जमीन पर सीधे लेट जाइए,हाथ और पैर को पूरी तरह ढ़ीला/निढाल छोड़ दीजिए, और गहरी सांस लीजिए। 20 मिनट इसी स्थिति में ही लेटेे रहिए। आप इसके बाद काफी उर्जावान महसूस करेंगे।

बुधवार, 28 जून 2017

ऑनलाइन कत्थक सीखें 1

चैप्टर-1
प्रणाम/नमस्कार
कथक में अभिवादन को सलामी या नमस्कार कहते हैं. इसी से नृत्य प्रारंभ होता है. वैसे तो कथक में प्रणाम,नमस्कार,सलामी का बड़ा स्वरूप है. नृत्य पर मुगलों के प्रभाव से सलामी तोड़ेे नाचे जाते थे और वर्तमान में हिंदुओं का प्रभाव होने से सलामी तोड़ो की जगह बहुतायत में नमस्कार और गुरु या ईश वंदना ने ले ली है. यहां मैं नमस्कार/सलामी,तोड़ो से करने की बात नहीं कर रही हूं.सबसे पहला प्रणाम जो नृत्य के रियाज के समय या शिक्षा ग्रहण करने के समय किया जाता है,मैं उस प्रणाम के बारे में बता रही हूं.
जब भी आप रियाज करें तो उसके पहले प्रणाम करें, और नृत्य समाप्ति पर भी प्रणाम करें. यह प्रणाम आप मंच पर नृत्य आरंभ करने से पहले भी करें. सलामी,नमस्कार और वंदना के बारे में आगे के चैप्टर में बात होगी.
उत्पत्ति स्थान पर शिखर हस्तमुद्रा बनाएं. फिर कंधे से गोल घुमाते हुए पंजों पर संतुलन बनाते हुए बैठे,फिर पहले मंच/फर्श पर हाथों से पताका मुद्रा बनाते हुए स्पर्श करें. इसके बाद पताका मुद्रा बनाते हुए अपनी पलकों को स्पर्श करें. यह हमारा मातृभूमि के लिए सम्मान हुआ.
पलको को छूते समय सीधे खड़े हो जाएं. पैरों की स्थिति समपाद में होगी. फिर सबसे पहले सर के ऊपर पुष्पम बनाते हुए भगवान को प्रणाम करें.
अंत में कंधों से हाथों को घुमाकर उत्पत्ति स्थान पर अंजलि की मुद्रा बनाकर प्रणाम करें. यह प्रणाम गुरु के लिए हुआ.अगर आप मंच पर प्रस्तुति दे रहे हैं तो गुरु के लिए और दर्शक दोनों के लिए है. बस दर्शक के लिए अंजली मुद्रा बनाए हुए हाथों को बाईं कंधे की तरफ से दाहिने कंधे की ओर लाकर उत्पत्ति स्थान पर प्रणाम करना है.